डब्बा वाला की सफलता I Success Story Of Dabba Wala

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विष्णुपुर नामक एक गाँव में अमित नाम का एक डब्बा वाला अपने परिवार के साथ रहता था. अमित एक बहुत ही साधारण परिवार का आदमी था. उसकी पत्नी भीमा सिलाई करके थोड़े बहुत पैसे जमा करती थी और उनका बेटा अमर पढाई करता था. अमित घर का सारा खर्चा डब्बे वितारण करके जो पैसे मिलते थे, उनसे चला लेता था.

अमित हर दिन सुबह 8 बजे उठके, अपनी साईकिल पे शुरू होके, घर घर को जाके नाश्ते के डिब्बे इकट्ठे करता था. और उन डिब्बे में से कुछ पाठशाला में, कुछ कारखानों में समय पर पहुंचाता था. ऐसे ही, हर दिन बहुत डिब्बे वितारण करके डब्बे के 10 रुपये लेता था. आये हुए पैसों के साथ अपने बच्चे को अच्छे स्कूल में पढ़ाता था.

अमित जिस स्कूल में डब्बे पहुंचाता था, उसी स्कूल में उसका बेटा अमर पढ़ता था. उसके पिता का हर दिन ऐसे धूप और बारिश में साईकिल चलाना, पसीने में मेहनत करना अमर को बहुत दुःख देता था.

ऐसे ही जब अमित घर पे था, तो अमर ने समय देखकर अपने पिता से कहा -"पिताजी! मुझे आपसे बात करना है."

अमित -"हाँ, बोलो बेटा. कैसे पढ़ रहे हो तुम."

अमर -"मैं अच्छा पढ़ रहा हूं पापा. आपसे कुछ बात करना चाहता हूं."

अमित -"बोलो बेटा."

अमर -"पापा! आप मेरे लिए और मेरी स्कूल की फ़ीस के लिए बहुत मेहनत कर रहे हैं. आप ऐसे धूप और बारिश में बहुत दूर के किलोमीटर साईकिल चलाते हुए डब्बे पहुँचाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा."

अमित -"मेहनत के बिना पैसे कहाँ से मिलेंगे बेटा. भविष्य में तुझे एक बड़ा ऑफिसर बनाऊंगा. मेरी तरह ऐसे छोटे काम नहीं करना है तुम्हे. और पसंद करें तो, सब कुछ अच्छा लगता है बेटा."

पिताजी की बातें सुनकर अमर सोचता है कि वो सारी बातें सच हैं. पर फिर भी, उसे तसल्ली नहीं होती है. और अपने पिताजी को ऐसे मेहनत करते देख नहीं पा रहा था. उसने सोचा कि इन सब का हल सिर्फ उसका अच्छा पढ़ना ही होगा. इसलिए वो दिन रात मेहनत से पढाई करता है.

ऐसे पढाई करते वक्त अमर को अपने पिता का काम आसान करने का एक उपाय सूझता है. तुरंत उसके सारे विचार वह एक पेपर पर लिखता है.

अगले दिन, अमर अपने पिता के घर होते समय देख अपने विचार सारे उनसे कहता है -"पापा आपके ही काम में मेहनत के बिना आपके साथ ज्यादा लोग काम करते हुए अब की आपकी आमदनी से भी ज्यादा पैसे कमाने के लिए मेरे पास एक उपाय है. और इसमें आपको निवेश रखने की भी कोई जरुरत नहीं है."

अमित -"क्या बात कर रहे हो तुम! व्यापर चलाने की क्षमता हममें नहीं है. जाओ जाके पढो बेटा."

अमित की पत्नी कहती है -"ये क्या बात हुई जी! पहले सुनो तो सही, कि वह क्या कहना चाहता है. अगर वो ये कह रहा है कि निवेश के बिना ज्यादा पैसे कमाने का उपाय है, और वो भी इतनी छोटी उम्र में. आपको तो खुश होना चाहिए न."

अमर -"मेरी बात तो सुनिए पिताजी! ये मुमकिन है."

अमित -"चलो ठीक है, बोलो. मैं भी तो जानू. कि ये कैसे मुमकिन है."

अमर अपने विचार अपने पिता को बताना शुरू करता है -"पापा! हमारे गाँव में कुल मिलकर 150 परिवार हैं. आपकी गिनती के अनुसार डब्बा देने वोलों के परिवार में कारखानों में काम करने वाले, सरकारी कार्यालय में काम करने वाले, स्कूल और कॉलेज जाने वाले होंगे. इसीलिए उन सारी जगहों में मैं अपने दोस्तों के साथ नौकरी का मौका है. इच्छुक लोग आवेदन कर सकते हैं. वे अपना नाम और पता दे के अपनी नौकरी तुरंत शुरू कर सकते हैं. हम दीवारों पर पर्चे चिपकायेंगे और जो भी उसे पढ़कर हमारे पास आएगा उसे नौकरी पर रख लेंगे. ऐसे में महीने के अंत में जितना पैसा आएगा, उसमे से आधा उन्हें दे देंगे और आधा हम रख लेंगे" 

अमित -"ये पढाई का ज्ञान तुम्हारा है बेटा. ठीक है चलो देखते हैं. तुम जाकर अपने दोस्तों के साथ पर्चे चिपका दो." 

अपने पिता का दिया हुआ अवसर देख अमर अपने दोस्तों के साथ स्कूल, सरकारी कार्यालय, कारखाने और कॉलेज जैसे जगहों पर उन पर्चों को चिपका देता है. और इतना ही नहीं, वहां पे लोगों को भी उसने बताया कि उसके पिता ने एक नया व्यापर शुरू किया है और उसमें नौकरी का अवसर है.

सभी को अमित के व्यक्तित्व के बारे में सालों से पता है क्योंकि वे डब्बा वाला की तरह सालों से काम कर रहे हैं. इसलिए गाँव के लोग उसके साथ काम करने के लिए सहमत हो जाते हैं. 

नौकरी के विज्ञापन करने के कुछ ही दिनों में 60 लोग अमित के घर नौकरी के लिए आते हैं. आये हुए 60 लोगों को 5 अलग अलग भाग के जगहों के लिए विभाजित कर दिया जाता है. 12 लोग कारखानों के लिए, 12 सरकारी कार्यालय के लिए 24 लोग स्कूल और कॉलेज के लिए और 12 को बाकी जगहों का काम दिया जाता है.

इन सब को डब्बे इकठ्ठा करके उन्हें उनके जगहों पर पहुँचाना था. और सब काम पर लग जाते हैं उनकी साईकिल पे.  पहले महीने बाद डब्बा बेचने वाले परिवार उनको उनके महीने का पैसा 600 दे देते हैं. ऐसे ही 175 परिवार 600 रुपये महीने के भरने के बाद अमर के पिता के पास 1,05,000 रुपये आते हैं.

1,05,000 रुपये का आधा अपने कर्मचारियों को देने के बाद भी अमित के पास 52,500 रुपये बच जाते हैं. यह देखकर अमित को अपने बेटे की समझदारी गर्व होता है.

देखते ही देखते अमित एक बहुत बड़ा व्यापारी बन जाता है. अमित की इस जीत का गाँव के सारे लोग अभिनन्दन करके उसका सत्कार करते हैं. 

उस समय पर अमित कहता है कि सत्कार उसका नहीं, बल्कि उसके बेटे का करना चाहिए. इस जीत के पीछे मैं नहीं, बल्कि मेरा बेटा है. 16 साल के मेरे बेटे से मेरी मेहनत और मेरा पसीना देखा नहीं जा रहा था. और उसने तब इस व्यापर के बारे में सोचा. मेरे पास आके उसने इस उपाय के बारे में कहा. पढ़ा लिखा न होने के कारण मुझे तो यह सब समझ में नहीं आया, पर उसने हार नहीं मानी और मुझे इस व्यापर के बारे में सब कुछ समझाया. मेरा बेटा ही असली हीरो है.


शिक्षा -"अच्छे विचार सोचने के लिए उम्र की कोई जरुरत नहीं होती."

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डब्बा वाला की सफलता I Success Story Of Dabba Wala डब्बा वाला की सफलता I Success Story Of Dabba Wala Reviewed by hindi stories on November 16, 2019 Rating: 5

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